Sunday, September 13, 2015

gumshuda...!

एक लम्हा ज़िन्दगी का इस कदर ठहरा एक मुकाम पर आके
जैसे कोई किनारा मिला भेहति हुई नदी को मझधार के पार जा के

खामोशी इतनी की सन्नाटा भी चीख चीख कर है कह रहा अब तो
मत छूओ मुझको मत करो कोई बात रहने दो चुप बस लब को

चलता हुआ अंधेरो मैं गुमशुदा सा एक साया मेरी उम्मीद से रोशन
तेरे पहलू की आगोश में सर रख कर खोने की तड़प से गुमसुम सुन

जाता न कहीं आता खोया न मौजूद तरंग से परेह सिसकियों का शोर
अटका समय की सीमा से उस और घूम रहा अपनी ही चारों और

बजता किसी नाद की धाप के जैसा लभ ढब लभ ढब धड़कनो सा
सबकी पकड़ से दूर गुमनाम किसी गली मैं खोया लापता सा

दर्द से बेगाना नो कोई रिश्ता न कोई ठिकाना हमदर्द भी नहीं कोई
सकूँ की बेइंतिहा मुहोबत का अफ्फसाना मेरा घर तेरा अाशियाना


Saturday, September 12, 2015

buried alive and deep....!

Today in meditation I felt my head go deep under your right foot and you crushed it nice and hard till it turned into fine powder and then you picked up a fistful of the bhasma and applied it all over your self. An anklet and some tinkles around your feet also appeared out of nowhere. .. Bury me deep below the surface of earth and let me be the dust of your lotus feet.... you are in me hidden covered away from everyone unknown unknowable paused continuum of eternal blissfully quiet presence like fragrance in the flowers soundless ness in consolidated silence a lump in throat waiting for eternity yearning without an iota of movement stilling conciousness running through the network of dependently independent fibre of my being less being......https://www.facebook.com/kohlineeraj/posts/10153004068381333?notif_t=like